यन्त्र साधना की आवश्यक बातें


यन्त्रों के द्वारा स्वयं ही स्वयं का उपचार करें।

  • यन्त्र शीघ्र प्रभाव दिखाते हैं।
  • कलियुग में यन्त्रों को विशेष प्रभावी कहा गया है।
  • यन्त्र धारक के शरीर पर आकाशीय ग्रहों की भाँति कार्य करता है।
  • नित्य यन्त्र लिखने से भूत प्रेतादि जैसी समस्यायें पैदा नही होती, यदि हुई हों तो शीघ्र ही समाप्त हो जाती हैं।
  • यन्त्रों में जो शक्ति है वह तो प्रबल है ही। इसमें और भी अधिक शक्ति का संचार यन्त्र का साधक अपनी आत्मा के बल से प्रस्तुत करता है।
  • यन्त्रों से लाभ उठाने के लिए यन्त्रों पर विश्वास करें।
  • वशीकरण, शान्ति तथा पौष्टिक यन्त्र लिखते समय प्रसन्न मुद्रा में रहें तथा मुख में मीठा पान रख लें। मारण, स्तम्भन तथा उच्चाटन आदि के यत्र लिखते समय काले वस्त्र पहनें तथा मुख में विरसता पैदा करने वाली कोई चीज रख लें।
  • यन्त्र, मन्त्र तथा तन्त्र एक दूसरे के पूरक हैं।
  • रेखांकन को यन्त्र कहते हैं।
  • शब्दों के समूह को मन्त्र कहते हैं।
  • वनस्पति की गुह्य शक्ति को तन्त्र कहते हैं।
  • यन्त्र, मन्त्र तथा तन्त्र का एक साथ प्रयोग करने वाले को तान्त्रिक कहते हैं।
  • यन्त्र को लिखना तथा उससे लाभ उठाना अत्यन्त सरल है।
  • आज भी कई विशेष धार्मिक तीर्थ स्थलों पर, मुख्य द्वार पर तथा मूर्ति के पास पत्थरों पर खुदे यन्त्र दृष्टिगोचर होते हैं।
  • बहुत से मन्दिरों के बुर्ज तथा भीतरी हिस्से यन्त्र की शैली के अनुसार बनाये गये मिलते हैं।
  • यन्त्र साधन तांत्रिक विद्या का सबसे सरल तथा सुलभ साधन है।
  • यन्त्र कभी निराश नहीं करते।
  • यन्त्र आत्मबल बढ़ाते हैं।

यन्त्र साधना से पहले यह सब ध्यान रखें!

  • यन्त्र विद्या यद्यपि प्रतिमा पूजा काल के युग से भी बहुत प्राचीन है। इस पर भी एक आकर्षण का केन्द्र है। मन्त्र शास्त्र की अनेक कठिनाइयों को देखते हुए ही सम्भवत: यन्त्रों को सहर्ष स्वीकार किया गया था। जबकि यन्त्र निर्माण भी कोई आसान पद्धति नहीं है। रेखात्मक, वर्णात्मक, अंकात्मक अथवा समन्वयात्मक पद्धति से बनाये गये धातुमय, वर्णमय अथवा लिखित यन्त्र में, उसके देवता की स्थापना की जाती है और इन यन्त्रों को पूजन यन्त्र या धारण यन्त्र कहा जाता है।
  • देश, काल और पात्र का विचार करके जो कार्य किया जाता है वह पूर्णत: सफल होता है। अत: प्रयोग कर्ता को साधना मार्ग में प्रवेश करने के पश्चात् अनेक बातों का सदैव स्मरण रखना चाहिए। जरा सी भूल से प्रयोग विपरीत फलदायक होकर हानि देने लगता है या स्वयं ही निष्फल, प्रभाव हीन रहता है।
  • यन्त्र अपने आप में एक रहस्य है । इस रहस्य को अनुभव करके ही जाना जा सकता है। यन्त्र की पहली शर्त ही गोपनीयता है। यन्त्र शब्द ‘यं’ धातु से निष्पन्न होता है। इसका अर्थ सयंमित करना और केन्द्रित करना ही होता है। अभीष्ट सिद्धि के लिए अधिष्ठातृ देवता की शक्ति पर ध्यान लगाने में यन्त्र विशेष यन्त्र विद्या एक गहन विद्या है और पलों में ही यह लाभ देने वाली है। देव, ब्राह्मण, औषधि, मन्त्र, यन्त्र आदि भावना के अनुसार ही फल देते हैं। अत: यदि यन्त्र को सामान्य मानकर लिखा जायेगा तो निश्चय ही उसका फल भी सामान्य ही होगा। यह सोचना केवल मूर्खता ही है कि यन्त्र तो छोटा सा है, ये फल क्या करेगा? क्या परमाणु बहुत बड़ा होता है ? ध्यान से सोचें तो एक अति सूक्ष्म अणु ही तो है जिससे सारा संसार भयप्रद है। यन्त्र को सिद्ध करने के लिए प्रयोजन के अनुसार दिन, तिथि, नक्षत्र, मास आदि समय निर्धारित किये गये हैं। इसके लिखने के लिए स्याही, कलम तथा आधार पत्र भी प्रयोजन के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं।
  • यन्त्र और उसकी शक्ति पर सदैव श्रद्धा एवं विश्वास रखें क्योंकि श्रद्धा और विश्वास से ही ईश्वर को प्राप्त किया जाता है। सभी कार्य शान्ति एवं सन्तोष से ही फलदायक होते हैं। आतुरता या शीघ्रता से किये जाने वाले कार्यों में विकार का आ जाना स्वाभाविक ही है। चंचल चित्त से होने वाली क्रियाओं में विधि के लोप हो जाने का भय बना रहता है और जब विधि लोप हो जाये तो सिद्धि कहाँ?
  • जिस भाँति मन्त्र को देवता की आत्मा माना जाता है, उसी भाँति यन्त्र देवता का निवास स्थल माना जाता है। अत: जिस भाँति की सावधानियाँ मन्त्र के प्रयोग काल में स्मरण रखनी होती हैं वहीं सावधानियाँ यन्त्र के प्रयोग काल में आवश्यक हैं। इन सावधानियों का वर्णन नीचे किया जायेगा। चूँकि यन्त्र देवता का स्थल अर्थात् निवास स्थान माने गये हैं। अत: इसके निर्माण में पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास का होना नितांत आवश्यक है। यन्त्रों की रचना करते समय रेखा, चक्र, त्रिकोण आदि का शुद्ध भाव से अवलम्बन करके ही प्रयोग का प्रारम्भ करना चाहिए। प्रयोग में देखा गया है कि यन्त्र निर्माण करते समय बनाई जाने वाली आकृत्ति के कारण साधक के अन्त:करण में अनेक तरह के तूफान आन्दोलित तथा स्पन्दित होते हैं परन्तु इनकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

यन्त्रों का प्रयोग पूर्ण लग्न, श्रद्धा एवं विश्वास से करना चाहिए। बिना विश्वास एवं श्रद्धा के यन्त्र से लाभ प्राप्त नहीं होता । यन्त्र में प्रत्येक रेखा की एक माप होती है तथा इन रेखाओं द्वारा निर्मित कोष्ठों आदि का आयतन समान ही होना चाहिए। यन्त्र को रेखांकित करने के बाद यन्त्र के मध्य भाग में संख्या बीज, वर्ण बीज तथा बिन्दु बीज आदि को लिखा जाना चाहिए।
यत्रों में दिव्य तथा आलौकिक शक्तियों का निवास अवश्य ही होता है। तभी तो इसके पूजन करने से, दर्शन से तथा धारण करने से लाभादि हो जाते हैं। यन्त्रादि के प्रयोग करने से जो सावधानियाँ स्मरण रखनी चाहिए, उन्हें लिखा जा रहा है-गुरु पुष्य, रवि पुष्य, ग्रहण, दीपावली तथा होली की रात्रि को शुभ माना जाता है, किया जाने वाला प्रत्येक प्रयोग पूर्णत: प्रभावी होता है। इस समय दिशाशूल, चन्द्र आदि का विचार नहीं किया जाता । अत: साधकों को चाहिए कि उपर्युक्त समय में ही प्रयोग का शुभारम्भ करें।
यत्रादि के प्रयोग में छः कर्म होते हैं जिन्हें कि शान्ति कर्म, वशीकरण कर्म, स्तम्भन कर्म, विद्वेषण कर्म, उच्चाटन कर्म तथा मारण कर्म कहा जाता है। इन कर्मों की देवियाँ भी मानी गई हैं जो कि निम्न भाँति हैं

शान्ति कर्म-इस कर्म की देवी रति को माना गया है। भगवती रति, कामदेव की पत्नी हैं।
वशीकरण कर्म-इस कर्म की देवी भगवती सरस्वती को माना गया है।
स्तम्भन कर्म-स्तम्भन कार्य में किये जाने वाले कर्म की देवी लक्ष्मी जी हैं।
विद्वेषण कर्म-इस कर्म के लिए भगवती ज्येष्ठा को माना जाता है।
उच्चाटन कर्म-इस कार्य के प्रारम्भ में भगवती दुर्गा को पूजने को कहा गया है।
मारण कर्म- इस कर्म की देवी महाकाली जी को माना जाता है।

अत: साधकों को चाहिए कि प्रयोग के प्रारम्भ काल में ही कर्म से सम्बन्धित देवि का पूजन करके अपने मत को प्रकट कर दें। अच्छा तो यह रहता है कि पूजन के पहले ही हाथ में जल लेकर विनियोग कर लिया जाये।
कर्म की परिभाषा ऊपर प्रत्येक कर्म की देवी के विषय में समझाया गया है। उन कर्मों की अपनी ही एक परिभाषा भी होती है जो कि निम्नलिखित शान्ति कर्म-जिस प्रयोग के करने से रोगों का, किये कराये का, ग्रहादिकों का निवारण होता है उसे ही शान्ति कर्म कहा जाता है।

वशीकरण कर्म-जिस प्रयोग को करने से दूसरे व्यक्ति जी हजूरी करें ऐसे कर्म को वशीकरण कर्म कहा जाता है।
स्तम्भन कर्म-किसी चल रही क्रिया को रोक देना ही स्तम्भन कर्म कहलाता है।
विद्वेषण कर्म-दो गहरे मित्रों के बीच शत्रुता करा देने वाले कर्म को ही विद्वेषण कर्म कहा जाता है।
उच्चाटन कर्म-जिस क्रिया के करने से अच्छा भला व्यक्ति भी स्थान छोड़ कर दूर जा बसे, इसे ही उच्चाटन कर्म कहते हैं।
मारण कर्म-किसी के भी प्राण ले लेने की क्रिया को मारण कर्म कहा जाता है। कर्म तो छ: ही माने गये हैं,

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