ये उपायों से दूर करें कुंडली में पितृदोष


पितृ दोष निवारण उपाय – “नानक दुखिया सब संसार” इस संसार में कोई सुखी ही कहाँ है। सुख- और समृधि अपने – अपने परिवार में देखने की इक्छा हर किसी की होती है। इसी सुख को पाने के लिए इन्सान दिन रात मेहनत करता है। कभी – कभी पूरा जीवन कष्ट झेलते ही बीत जाता है, फिर भी यह समझ नहीं आता कि मेहनत करने पर धन और सुख क्यों प्राप्त नहीं हो पा रहे है।

पितृ दोष निवारण उपाय

कई बार जैसी करनी, वैसी भरनी कह कर हम दूसरों का उपहास करते है। जानकार इसे कर्म का दोष मानते है। पूर्व – जन्म के कारण कुंडली में पितृ-दोष लगता है।

पितृ- दोष और कारण –

जिन कारणों से पितृ- दोष लगता है, वह मानताएं जो जन साधारण में प्रचलित है।

  • “पितृ” यानि पिता जिसे जीविका का आधार माना गया है, तभी हम श्राध-कर्म, करते है और पितरों कों जल दे भोजन करातें हैं ।
  • संस्कृत में पितृ यानि पिता, पितर,पूर्वजों को पितर कहा जाता है। पूर्वज ऐसी आत्मा जो जीवित नहीं है, पूर्वज कहलाती है।
  • ज्योतिष जानने वाले मानते है कि नीच ग्रह नक्षत्रों के योग के कारण अकाल मृत्यु होती है।
  • अकाल मृत्यु— अकस्मात निधन हो जाए, या किसी दुर्घटना का कोई शिकार हो जाए। घर में कोई आत्महत्या कर ले। जहर खा कर या फांसी लगा ले, कुएँ में कूद कर अपनी जान दे, दे। कोई या आग लगने से मरे या ऐसी किसी भी अप्राकृतिक अवस्था में जान दे ,या मृत्यु का शिकार हो जाए उसका एक मात्र कारण है, पितृ- दोष।
  • जब किसी कार्य को करने में बाधा आए या जीवन नर्क समान बन जाए, तब समझ लेना चाहिए कि कुंडली में पितृ- दोष है। अकाल मृत्यु हो जाने पर आत्मा की शांति नहीं होती। इसलिए आत्मा मृत्यु –लोक में भटकती रहती है।
  • नव-शिक्षित समाज में इन मूल्यों का हास हो गया है। पूर्वज तो पूर्वज जीवित माता- पिता का कोई मूल्य नहीं रह गया है। ऐसे में जब समस्या आती है तभी निवारण के लिए लोग प्रयत्न करते है। घर परिवार के लोग अपने बुजुर्गों ओर पितरों को भूल जाते है, उसी कारण से आने वाली पीड़ी भी पितृ- दोष से पीड़ित हो जाती है।

आध्यातम के अनुसार संसार में सारे मनुष्य त्रिविध कष्ट भोग्तें है।

1- आध्यात्मिक 2. अधिभौतिक 3 अधिदैविक ये तीन प्रकार के कष्ट होते है।

ये कष्ट आत्मा के को कष्ट पहुँचने और पहुँचाने के कारण से होते है। कोई लाभ अगर किसी को दुख पहुंचा कर किया जाता है, तो वह अधिभौतिक कष्ट कहलाता है। हमारे लाभ इक्छा, कामनाये, जो जिनकी पूरित करने के लिए हम आत्मा को कष्ट देते है, वही पितृ- दोष कहलाते है।

यहाँ हम उन कष्टों कि बात कर रहे है जो पितृ- दोष के कारण भोगने पड़ते है।

  • घर में विवाह योग्य बच्चों का विवाह ना हो पाना और वैवाहिक जीवन में क्लेश होना।
  • परिश्रम के बाद भी सफ़लता ना मिलना सफ़लता में संदेह होना।
  • व्यवसाय में हानि या उतार- चड़ाव रहना।
  • नौकरी लगने में देर होना या नौकरी लग के छुट जाना।
  • शादी के बाद गर्भ-धारण में समस्या गर्भपात होना या संतान होने में कष्ट होना।
  • संतान का विकलांग हो जाना ।
  • बच्चों की अकाल मृत्यु होना या घर के सदस्यों का एक- एक कर के मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों के विरुद्ध कार्य करना।

माना जाता है, पितृ- दोष प्रारब्ध का दोष है। इस कारण से जिन हिन्दू घरों में अपने बड़ों का सम्मान नहीं, उन घरों में जन्म लेने वाले शिशुओं को पितृ- दोष लग सकता है।

ज्योतिष के अनुसार, पितृ- दोष जन्म कुंडली में दोष का निर्धारण प्रथम, दिवितीय,पंचम, सप्तम, दशम, तथा नवम भाव सूर्य राहू और शनि के आधार पर होता है। जन्म कुंडली में नवा भाव पिता और पितरों का भाव ,स्थान कहा गया है। यह स्थान जातक कि कुंडली में भाग्य का स्थान कहा गया है।

महर्षि पराशर मुनि के ग्रन्थ ब्रह्त्परशर होरा शास्त्र में सूर्य पिता कारक है और राहू छाया ग्रह है। जिस समय राहू कि युति यानि दृष्टि- संबंध सूर्य के साथ होता है तब सूर्य ग्रहण लगता है। इसी प्रकार जब जातक कि कुंडली में सूर्य –राहू की युति एक ही भाव एक ही राशि में होती है तो पितृ- दोष जन्म कुंडली में पाया जाता है।

  • कुंडली में केतू कमज़ोर हो या द्वितीय, नवम, दशम भाव पर भावेश पापी ग्रहों का प्रभाव हो। इसके साथ ही ग्रह अस्त या कमज़ोर हो तो पितृ- दोष कुंडली मे पाया जाता है।
  • लग्न और लग्नेश दोनों में से एक अत्यंत कमज़ोर स्थिति में हो।
  • लगनेश नीच का हो, उसी भाव में राहू और शनि युति संबंध बना रहे हो।ऐसे में पितृ-दोष जन्म कुंडली में पाया जाता है।
  • राहू यदि नवम में बैठ हो,और नवमेश में संबंध बनाता हो।
  • नवम भाव में ब्रहस्पति और शुक्र की युति बनाता हो, और दशम भाव में राहू और केतू का प्रभाव हो ।
  • शुक्र अगर मंगल और शनि द्वारा पीड़ित होता है।
  • जिस जातक कि कुंडली में दसमेश त्रि के भाव में हो साथ ब्रहस्पति पापी ग्रहों के साथ स्थित हो। लग्न और के पंचम भाव पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो, तब जातक की कुंडली में पितृ- दोष पाया जाता है।

ऐसे और कई ज्योतिष और खगोलीय कारण है, जिस से जातक की कुंडली पर पितृ- दोष का प्रभाव होता है।

पितृ दोष निवारण उपाय–

कुछ सरल उपाय जो ज्योतिष द्वारा बताए गए है।

  • सोमवार को व्रत रखे, नंगे पाँव जा कर इक्कीस आक, विल्वपत्र, पुष्प, कच्ची लस्सी के साथ पूजन कर इक्कीस सोमवार तक वर्त रखे।
  • पवित्र पीपल और बरगद के पेड़ लगाए। विष्णु भगवान के मन्त्र जाप और भगवत गीता का पाठ करने से पितृ- दोष में कमी आती है।
  • प्रतिदिन इष्ट देवता की पूजा करने से पितृ- दोष का शमन होता है।
  • कुंडली में पितृ- दोष हो तो किसी गरीब की बीमारी में सहायता करें या उसके विवाह में सहयोग करना चाहिए।
  • अपने स्वजन बंधुओ कि निवार्ण तिथि पर तर्पण कर ज़रुरत मंदों को भोजन कराए।

आपका कार्य सिद्ध हो इसके लिए जातक अपनी कुंडली जानकार व्यक्ति को दिखा कर परामर्श ले।

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