Boyfriend Ko Manaye ke tips

Boyfriend Ko Manaye ke tips

यदि आपके जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या है तो आप उस समस्या से पूजा, पाठ एवं अनुष्ठान के माध्यम से छुटकारा प्राप्त कर सकते है. पूजा पाठ एवं अनुष्ठान के माध्यम से आप जटिल से जटिल समस्याओं का सामाधान प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन को सरल एवं सुगम बना सकते है. प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार की समस्या अवश्य होती है जैसे_ पति पत्नी में अनबन, खोया प्यार पाना,किया कराया, ऊपरी बाधा , प्रेम विवाह, सौतन से छुटकारा, तलाक की समस्या, शादी में रुकावट, व्यापर में नुकसान, गृह क्लेश, बेटे में शादी में रुकावट, बेटी की शादी न होना, घर में खून के छींटे आना, नौकरी में रुकावट, पद्दोन्ती में रुकावट, संतान की समस्या, विवाह में बाधा , शत्रु से छुटकारा, पति वशीकरण, पत्नी वशीकरण, वास्तु दोष एवं गंडमूल आदि. यदि आप भी बताई गयी समस्याओं से ग्रसित है और इन सभी परेशानियों से छुटकारा पाना चाहते है तो आप हमारे आश्रम में सम्पर्क करके इन समस्याओं का निवारण प्राप्त कर सकते है.

यदि आपका बॉयफ्रेंड आपसे रूठ गया है और नाराज़गी के चलते वह आपसे बात नहीं कर रहा है या आपसे अलग हो गया है और आप उनकी याद में दिन रात रो रहे है तथा यह चाहते है की आपका प्रेमी या बॉयफ्रेंड फिर से आपसे बात करने लगे या फिर से आपके जीवन में लौट आये तो यह बिल्कुल संभव है की आपका प्रेमी आपके जीवन में लौट आये और पहले जैसे ही आपसे बात करने लगे. यदि आपके बॉयफ्रेंड ने किसी लड़ाई झगडे के कारण आपसे ब्रेकअप कर लिया है या उन्होंने आपको अपने जीवन से दूर कर दिया है तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है क्यूंकि हम आपको कुछ ऐसी विधियां बता रहे है जिनका उपयोग करके आप अपने रूठे बॉयफ्रेंड को मना सकते है और उनको अपने वश में करके कोई भी कार्य करवा सकते है तो ऐसे जानते है बॉयफ्रेंड को मनाने के बारे में .

Boyfriend Ko Kaise Manaye यह जानने हेतु यह विधि करें

बॉयफ्रेंड को कैसे मनाये? आप इस प्रश्न के उत्तर हेतु हमारी इस विधि को कर सकते है. आपको अपने बॉयफ्रेंड को मनाने के लिए शनिवार के दिन एक पान का पत्ता घर लाकर पत्ते को गंगाजल की सहायता से धो लें और उस पत्ते को कुछ समय के लिए धूप में सूखा लें और जब पत्ता पूरी तरह से सूख जाये तो उस पत्ते के ऊपर पीले चंदन से आप निचे दिए गए यंत्र को बना लें.

यंत्र को बनाने के बाद आप पत्ते को किसी वटवृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर दबा दें और उस स्थान के ऊपर आप एक मिटटी का दीपक तथा धूप या अगरबत्ती जला दें. इस यंत्र के प्रभाव से आपका प्रेमी या बॉयफ्रेंड आपके पुनः बात करने लगेगा .

अपने प्रेमी की नाराज़गी दूर करने के लिए आप शनिवार के दिन एक आक का अखंडित पत्ता घर लेकर कच्चे दूध की सहायता से धो लें और उस पत्ते पर आप लाल सिंदूर से इस यंत्र का निर्माण करें.

यंत्र का निर्माण करने के बाद आप इस यंत्र पर अपने प्रेमी का नाम 108 बार पुकारे और नाम पुकारने के बाद आप इस आक के पत्ते को काले रंग के कपडे में कलावे की सहायता से बांध दें. इतनी विधि करने के बाद आप उस पत्ते को अपने प्रेमी के घर के अंदर फेंक दें या घर के बाहर रख दें. इस विधि के प्रभाव से आपका प्रेमी आपको पुनः प्राप्त हो जायेगा.

Apne Pyar Ko Wapis Pane Ka Totka निम्नलिखित विधि से कीजिये

अपने प्रेमी को वापिस पाने के लिए आप अमावस्या के दिन आप इस यन्त्र को लाल चंदन, कुमकुम, गेरोचन, कस्तूरी को मिलाकर स्याही बनाये तथा चमेली की कलम से भोजपत्र पर लिखे और देवदत्त के स्थान पर अपने प्रेमी का नाम लिखे। फिर राई से बने कामदेव के पुतले के हृदय पर यंत्र रखकर उस पुतले को लकड़ी के तिनकों पर रखकर विधुत पूजा करें.

इस यंत्र की नित्य 11 दिन तक पूजा पाठ करने से आप अपने प्रेमी को पुनः अपने जीवन में प्राप्त कर सकते है. यदि आपका प्रेमी आपसे बात नहीं कर रहा है और आपको छोड़कर जा चूका है तो यह यंत्र आपकी सहायता करेगा आपके प्रेमी को पुनः प्राप्त करने में. इस यंत्र को कन्या माहवारी के समय न बनाये.

सरकारी नौकरी पाने के लिए करें ये उपाय

सरकारी नौकरी पाने के लिए करें ये उपाय

आज की भागम-भाग जिंदगी मे हर व्यक्ति के लिए अपनी जीविका चलाने के लिए जरूरी हो चुका है की उसके पास एक नौकरी हो। नौकरी को एक सुखी-सम्पन्न जीविका का आधार माना गया है। ऐसे मे अगर किसी की भी नौकरी हाथ से जाती है तो उस इंसान को मानो तमाम चिंताए आकर घेर लेती है। ऐसे मे पंडित, शास्त्री, साधू-बाबा के पास जाने से लेकर कुछ लोग तो जादू-टोटके तक का सहारा लेते है, ताकि उनकी नौकरी पर कोई आच न आ जाये या फिर जल्द-से-जल्द कोई नौकरी मिल जाये। बहुत से ऐसे लोग होते है जिनहे सरकारी नौकरी से बेहद लगाव होता है, उनकी नज़र मे सरकारी नौकरी मिलना ही सबसे सुरक्षित है। ऐसे मे वो सालो-साल सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भरते रहते है। तो चलिये आज नौकरी से जुड़े विषय पर ही हम आप कुछ उपयोगी जानकारी देते है, जिसके तहत आप जान सकेंगे की नौकरी कैसे प्राप्त की जाये या आपकी कुंडली मे नौकरी का योग कैसा रहता है।

कुंडली में सरकारी नौकरी प्राप्त करने उपाय

ऐसा कहां गया है कि जो ग्रह सबसे अधिक बलवान होकर लग्न, लग्नेष आदि व्यवसाय के द्योतक अंगों पर प्रभाव डालता है, वही ग्रह व्यक्ति की आजीविका को दर्शाता है। दूसरी विधि से दषम भाव में, लग्न में स्थित राशि से व्यापार क्षेत्र व इनमें स्थित ग्रहों के स्वभाव के अनुसार व्यवसाय का निर्धारण होता है। इसके अलावा यदि द्वितीयेश का छठे या षष्ठेश ग्रह से संबंध होने पर व्यक्ति के नौकरी के आसार बनते है, क्योंकि 2, 6 का संबंध अल्प धन प्रदान करता है। व्यक्ति की कुंडली मे ग्रहों की दशा के अनुसार ये बात भी निर्धारित होती है की वो नौकरी करेगा या फिर व्यापार। व्यक्ति की कुंडली मे सप्तम भाव व्यवसाय का भाव दिखाता है जबकि छठा घर नौकरी का भाव होता है। जब द्वितीय, दशम व एकादश भाव का संबंध सप्तम से होता है तब व्यक्ति के व्यवसाय आसार बनते है और उसी प्रकार छठे से संबंध होने पर नौकरी करने के आसार बनते है।

इसी प्रकार कुंडली आपको बहुत कुछ और भी बताती है, जैसे कि कुंडली के 10वे भाव में अगर मंगल मकर राशि होता है तब व्यक्ति के अच्छी सरकारी नौकरी मिलती है। अगर कुंडली के केंद्र में किसी उच्च राशी का ग्रह विद्यमान होता है और उसके साथ कुंडली के केंद्र मे किसी शुभ ग्रह की दृष्टी होने से भी व्यक्ति की नौकरी में तरक्की की सम्भावना होती है। कुंडली के 10वे भाव में अगर सूर्य होता है और उसके साथ गुरु भी उच्च राशी में हो या मित्र राशी में हो तो इसकी वजह से भी व्यक्ति को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिलने के योग बनता है।

कई बार इंसान काफी मेहनत करता है, पर उसके बावजूद भी उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती। ऐसे मे आप इस उपाय को अपनाकर देख सकते है। इसके अंतर्गत आप भगवान विष्णु का नाम लेकर यज्ञ कर ले। इसके बाद कुश लेकर उसकी मदद से अपने पितरों की प्रतिमा/मूर्ति बनाकर, उसे गंगाजल से स्नान करावा ले। इसके बाद इसपर यज्ञ की विभूति लगा दे और अच्छी नौकरी मिल जाने की प्रार्थना करें। इतना सब कर लेने के पश्चात् आप किसी भी धार्मिक ग्रंथ के एक अध्याय का पाठ करले। उस मूर्ति को आप बहते पानी मे प्रवाहित कर दे। इस उपाय को करने से नौकरी के आसार जल्द बन जाएँगे और नौकरी मिलने के बाद आप ब्राहमण या किसी गरीब व्यक्ति को दान जरूर दे।

आप इस टोटके का सहारा भी ले सकते है, जो करने मे बेहद आसान रहेगा। इसके अंतर्गत खास तौर से सरकारी नौकरी की चाहत रखने वाले लोग गंगाजल को एक पीतल के लोटे में डालकर रख दें, फिर इसके अंदर चांदी की किसी भी धातु को डाल दें। इसके बाद इस लोटे को सिर के उपर से 7 बार घुमा ले और फिर इसे ईशान कोण में रखकर मंत्र: “ओम् गंगाधराय नमः” का 21 बार जप करें। अन्य उपाय के लिए आप शुक्ल पक्ष के महीने में सात डलियां गुड़ की और सात हल्दी की साबुत गांठ किसी पीले रंग के कपड़े मे बांधकर रख दे और साथ ही उसमे एक रूपये का सिक्का भी डाल दे। फिर इसे सड़क या रेल लाइन के पार फेक आए और मन में नौकरी के लिए प्रथना करे।

अगर सरकारी नौकरी चाहते है तो पहले सोमवार के दिन सूर्य के ढ़लने के समय एक सफेद रंग के कपड़े में काले चावल के साथ कुछ दक्षिणा को एक साथ बांधकर माँ काली के मंदिर में चड़ा आए। 11 महीने तक लगातार ऐसा करने से सरकारी नौकरी के आसार बनाने लगते है। ये दूसरा उपाय यकीनन आप कर सकते है बड़ी आसानी से, जिसके लिए नौकरी की तलाश मे जब घर से निकले तो गुड़- चना खा ले और रास्ते में किसी गाय को भी आप अपने हाथों से गुड-चना खिला दें। ऐसा करने से नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

तो देखा आपने की ऊपर बताए गए कुछ बेहद आसान तरीको को अपनाकर कैसे व्यक्ति नौकरी- संबंधी समस्या से छुटकारा पा सकता है। साथ ही इसकी जानकारी को आप अपने उन मित्रों से भी सांझा कर सकते है जिनहे लंबे वक़्त सी कोई नौकरी नहीं मिल रही या अपनी पसंद की नौकरी चाहकर भी नहीं मिलती। तो यकीनन हमारे बताए कुछ उपाय आपकी मदद कर सकेंगे।

मनचाहा जीवनसाथी चाहिए तो करे ये सरल उपाय

मनचाहा जीवनसाथी चाहिए तो करे ये सरल उपाय

मनचाही शादी के टोटके, मनचाहा वर पाने का उपाय, मनचाहा जीवनसाथी पाने का मंत्र- भारत में विवाह एक पवित्र बंधन माना गया है| एक ऐसा मधुर बंधन जिसमें दो आत्माएँ सिर्फ इसी जीवन के लिए नहीं अपितु सात जन्मों के लिए बंध जाती हैं| सोलह संस्कारों में एक ‘विवाह संस्कार’ की महत्ता ही इसे श्रेष्ठ बनाती है| भारत में अब भी अधिकांश परिवारों में रिश्ते घर के बड़ों द्वारा तय किये जाते हैं, तथा प्रेम विवाह को सामाजिक स्वीकृति आज भी नहीं मिल सकी है| परंतु, किसी को पसंद कर लेने, प्रेम हो जाने अथवा मन में यह भाव पैदा होना कि ‘जीवनसाथी तो ऐसा ही चाहिए’ पर किसी का वश नहीं चलता है| यदि जीवनसाथी मनचाहा मिल जाए तो जीवन की अन्य चुनौतियों का सामना करना सरल हो जाता है| ज्योतिष शास्त्र में हर समस्या हेतु एक निश्चित समाधान दिया गया है| इच्छाशक्ति, नियम अनुपालन में प्रतिबद्धता तथा विश्वास हो तो मनचाही शादी होना कोई असंभव सी बात नहीं है|

मनचाही शादी करने के उपाय

नीचे कुछ विशेष मंत्रों तथा उसके जाप की विधि के साथ-साथ कुछ प्रसिद्ध चौपाइयों का वर्णन किया गया है| इनमे से अपनी इच्छा से किसी एक का चुनाव करते हुए आप अपने अभीष्ट को सिद्ध कर सकते हैं –

सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्यालिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशन्म।।

किसी योग्य पंडित से श्री नवदुर्गा यंत्र को अभिमंत्रित करवाकर अपने पूजा स्थल में रखें तथा उपर्युक्त मंत्र का जाप रूप से 1 माला नित्य नियमित रूप से चालीस दिनों तक करें| ऐसा करने से मनपसंद शादी करने में कोई अड़चन नहीं आएगी

‘‘ऊॅ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः” ;ह शुक्र देवता का मंत्र है। नियमित रूप से एक माला इस मंत्र का जाप करने से मनपसंद जीवनसाथी प्राप्त होता है |

वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नम: श्रेष्ठाय
नमो रुद्राय नम: नमो कालाय नम:
कलविकरणाय नम: बल विकरणाय नमो

रविवार अथवा सोमवार को स्नान के उपरांत पीत वस्त्र धारण करें, तथा शिव जी का ध्यान करें| ऐसा निरंतर दो माह तक करने से मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है|

ॐ श्री दुर्गायै सर्व-विघ्न-विनाशिनयै नमः स्वाहा|
सर्वमंगल-मंगलयै, सर्व-काम प्रदे देवी, देहिमे वांछित नित्यं, नमस्ते शंकर प्रिये||
दुर्गेशिवे भये माये, नारायणी सनातनी, जपे मे मंगले देहि, नमस्ते सर्व मंगले||

देवी गौरी की उपासना के लिए इस मंत्र का उपयोग देवी सीता ने किया था| विधि विधान से देवी पार्वती की पूजा के बाद इस मंत्र का जाप नित्य 11 बार करें|

अस्य स्वयंवरकलामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अतिजगति छन्दः, देवीगिरिपुत्रीस्वयंवरादेवतात्मनोऽभीष्ट सिद्धये

इस मंत्र का जाप विवाह योग्य युवक-युवती दोनो कर सकते हैं|

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुंअरि लई हंकारि कै।।

तुलसीदास रचित रामचरित मानस की इस चौपाई का निरंतर पाठ करने इस उद्देश्य में अवश्य सफलता मिलती है| इस चौपाई का पाठ युवक तथा युवती दोनों कर सकते हैं|

तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी।।
जेहि कें जेहि पर सत्‍य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।।

यह चौपाई रामचरितमानस के बालकांड से उद्धृत है| इसमे स्वयंवर से पूर्व सीता जी कहती हैं कि यदि मेरा प्रण सत्य पर आधारित है तो सभी के हृदय में बसने वाले राम उन्हें जीवनसंगिनी अवश्य बनाएँगे|

मनचाही शादी के टोटके

  • एक से अधिक दरवाजे वाले कमरे में सोएँ|
  • नवयुवक इसके लिए, नियमित रूप से केले का सेवन करें तथा सोते समय पीले रंग की चादर बिछाएँ|
  • कमरे के दक्षिण पश्चिम में ऐसा चित्र लगाएँ जिसमे लाल फूल बने हों|
  • नवयुवतियाँ सावन के सोलह सोमवार का व्रत रखें, तथा शिवजी से मनचाहा जीवनसाथी प्रदान करने हेतु प्रार्थना करें|
  • पार्वती जी के मंदिर में सुहाग-सामग्री अर्पित करें|
  • सोमवार को घर के पूजास्थल में अखंड दीप प्रज्ज्वलित करें|
  • गौ माता को प्रतिदिन घास खिलाएँ| ऐसा करने से मनपसंद विवाह में बाधक ग्रह दोष समाप्त होते हैं|
  • काले कपड़े न पहनें|
  • अपने प्रेयस/प्रेयसी को पुष्प भेंट करते समय कांटे उसमे से निकाल दें|
  • सोते समय दक्षिण दिशा में सिर तथा उत्तर दिशा में पैर रखें|
  • जब शादी की बात चलाने वाले घर आए तो उनके बैठने की व्यवस्था इस प्रकार करें कि उनका चेहरा घर के भीतर की तरफ हो|
  • नहाने के पानी में हल्दी मिला दें, तथा सूर्य देव को तांबे के लोटे में हल्दी मिश्रित जल से अर्घ्य दें| लोटे की पेंदी में जो हल्दी बच गया हो उसको गले तथा मस्तक पर लगा लें| एक माह तक निरंतर ऐसा करने से मनचाही शादी के मार्ग में आने वाली अडचन का कारण यदि गुरु है तो वह दूर हो जाता है|
  • मनचाहा वर पाने के उपाय

यदि कोई नवयुवती प्रेम में हो, नहीं भी हो परंतु मन में इच्छा हो कि भावी ऐसा होना चाहिए परंतु विभिन्न बाधाओं के कारण ऐसा न हो पा रहा हो, तो नीचे कुछ मंत्र तथा उसके पाठ की विधि दी गई है| ध्यान रखें मंत्र अथवा अनुष्ठान पूरी तरह आस्था का विषय है| आस्था न हो इन उपायों को न आज़माएं|

यदि विवाह योग्य किसी युवती के लिए मनचाहा रिश्ता नहीं आ रहा हो, तथा विवाह में विलंब हो रहा हो तो उसे देवी कात्यायनी की आराधना पूर्ण नियम निष्ठा से करना चाहिए| इसके लिए सर्वप्रथम एक निश्चित समय, आसन तथा पूजा स्थल चुन लें| पुनः निम्नलिखित कात्यायनी मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ उच्चारित करते हुए घृत, शक्कर मिश्रित ग्यारह आहूति दें –

कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।

नंदगोप सुतम् देवि पतिं मे कुरुते नमः॥

21 दिनों तक निरंतर 108 बार नित्य इस मंत्र के जाप तथा हवन से समस्त बाधाओ का नाश होता है, तथा मनचाहा जीवन साथी प्राप्त होता है| इसमे ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अनुष्ठान के 21 दिनों के बीच पूजा स्थान, पूजा समय, आसन आदि में परिवर्तन न हो|

नियमित रूप से पार्वती जी की पूजा करें तथा नीचे लिखे मंत्र का जाप करें 11 बार हर दिन करें-

‘ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः’’
‘ऊँ गौरये नमः

इसके अतिरिक्त एक अन्य मंत्र का जाप भी अत्यन्त लाभकारी है –

हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।

मनचाहा पति के लिए शिव-पार्वती दोनों की आराधना अत्यंत लाभकारी है| इसके लिए प्रतिदिन स्नान के बाद शिवलिंग पर कच्चा दूध मिश्रित जल चढ़ाएँ, पार्वती जी का पूजन करें तथा नीचे लिखे मंत्र का जाप करें

ऊँ साम्ब शिवाय नमः’
’’ऊँ पार्वत्यै नमः

कालसर्प योग कारण लक्षण उपाय

कालसर्प योग कारण लक्षण उपाय

कालसर्प योग, सभी शास्त्रों में कर्म-फल की बात बताई गई है। हम जैसा कर्म करते हैं, उसी के अनुरूप हमें फल भी मिलता है। कालसर्प योग के पीछे भी यही मान्यता और धारणा स्थापित हैं। मान्यताओं के अनुसार कालसर्प योग उस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है, जिसने अपने पूर्व जन्म में सांप को मारा हो या किसी बेकसूर जीव को इतना सताया हो कि उसकी मृत्यु ही हो गयी हो। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि जब व्यक्ति की कोई प्रबल इच्छा अधूरी रह जाती है तब व्यक्ति अपनी उसी इच्छा को पूरा करने हेतु पुनर्जन्म लेता है और ऐसे व्यक्ति को भी इस योग का सामना करना पड़ता है।

आपकी कुण्डली में कालसर्प योग है या नहीं, इस बात का पता आपकी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति को देखकर ही पता चलाया जा सकता है, लेकिन कई बार जन्म समय एवं तिथि का सही ज्ञान नहीं होने के कारण कुण्डली ग़लत भी हो जाती है और इस तरह की स्थिति होने पर कालसर्प योग आपकी कुण्डली में है या नहीं, इसका पता कुछ विशेष लक्षणो से ही जाना जा सकता है

कालसर्प के लक्षण निम्न हैं-

कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति को स्वप्न में मरे हुए लोग दिखाई देते हैं। मृतकों में अधिकांशत परिवार के ही लोग शामिल होते हैं। इस योग से प्रभावित व्यक्ति को सपने में अपने घर पर कोई परछाई दिखाई देती है और व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो कोई उसका शरीर एवं गला दबा रहा हो। सपने में नदी, तालाब, समुद्र आदि दिखाई देना भी कालसर्प योग से पीड़ित होने के लक्षणों में ही आता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, इस योग से पीड़ित व्यक्ति समाज एवं परिवार के प्रति समर्पित तो होता है पर अपनी निजी इच्छा को प्रकट नहीं करता और न ही उसे अपने सुख से अधिक मतलब होता है। ऐसे व्यक्तियों का जीवन संघर्ष से भरा होता है। बीमारी या कष्ट की स्थिति में अकेलापन महसूस होना या जीवन बेकार लगना, ये सभी इस योग के लक्षण हैं । इस प्रकार की स्थिति का सामना अगर आपको भी करना पड़ रहा है तो यह संभव है कि आप भी इस योग से पीड़ित हैं । इस योग की पीड़ा को कम करने के लिए इसका उपचार कराना बहुत ही आवश्यक है।

कालसर्प योग शांति अनुष्ठान-

कालसर्प योग के अनिष्टकारी प्रभावों से बचने के लिए शास्त्रो में जो उपाय बताए गये हैं, उनके अनुसार रोजाना पंचाक्षरी मंत्र “ऊँ नम शिवाय” अथवा महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार पाठ ऊवश्य करना चाहिए । काले अकीक की माला से प्रतिदिन राहु-ग्रह का बीज मंत्र, 108 बार भी जप करना चाहिए। साधारणत, काल सर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, जिनके नाम व उपाय निम्न हैं-

कालसर्प योग

अनंत कालसर्प योग-

अनन्त कालसर्प योग का उपाय- घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें। उॅ नमः शिवायः का जाप करें।

कुलिक कालसर्प योग-

कुलिक कालसर्प योग का उपाय-घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें। राहु-केतु के मन्त्रों का पाठ करें और उससे सम्बन्धित वस्तुओं का दान भी करें।

वासुकि कालसर्प योग-

वासुकि कालसर्प योग का उपाय-प्रतिदिन महामृत्युजंय मन्त्र का पाठ करें। पक्षियों को दाना-पानी दें एवं पितरों का प्रतिवर्ष श्राद्ध करें। घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें।

शंखपाल कालसर्प योग-

शंखपाल कालसर्प योग का उपाय- घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें। नित्य रूद्राष्टक का जाप करें।

पद्म कालसर्प-

पद्म कालसर्प योग का उपाय- इसके लिए कालसर्प योग शान्ति अनुष्ठान करायें। श्री कृष्ण की पूजा करें एवं घर में मोर के पंख लगायें। राहु-केतु से सम्बन्धित वस्तुओं का दान भी करें।

महापद्म कालसर्प-

योग महापद्म कालसर्प योग का उपाय- घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें। 1 वर्ष तक अमावस्या को श्राद्ध भी करें।

तक्षक कालसर्प योग-

तक्षक कालसर्प योग का उपाय- रूद्राष्टक का जाप करें। बहते पानी में प्रत्येक बुधवार को अपने हाथों से 100ग्राम जौ बहायें। कृष्ण जी की आराधना भी करें।

कर्कोटल कालसर्प-

कर्कोटल कालसर्प योग का उपाय- गले में 14 मुखी रूद्राक्ष की माला धारण करें एवं अपने बिस्तर के नीचे मोर पंख रखें। महामृत्युंजय का जाप भी करें।

शंखनाद कालसर्प योग-

शंखनाद कालसर्प योग का उपाय- घर के मुख्यद्वार पर चांदी का एक स्वास्तिक लगायें। प्रत्येक शनिवार को बहते जल में थोड़ा कोयला प्रवाहित करें। शिव जी की आराधना भी करें।

पातक कालसर्प योग-

पातक कालसर्प योग का उपाय- घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यन्त्र स्थापित करें और उसकी नियम से पूजा करें। कालभैरव की आरधना करें और सर्पों को दूध पिलायें।

विषाक्त कालसर्प योग-

विषाक्त कालसर्प योग का उपाय- बुधवार के दिन लोहे के सर्प को अपने हाथों से बहते पानी में बहायें। नित्य अष्टगंध का तिलक लगायें एंव महामृत्युजंय मन्त्र का जाप भी करें।

शेषनाग कालसर्प योग-

शेषनाग कालसर्प योग का उपाय- साल में एक बार नागपंचमी के दिन व्रत रखें एंव शिव जी का रूद्राभिषेक करायें। घर में एक सिद्ध कालसर्प योग शान्ति यंत्र स्थापित करें ।

जानें आपकी कुंडली में राजयोग है या नहीं

जानें आपकी कुंडली में राजयोग है या नहीं

राजयोग कुंडली, महर्षि पंतांजलीद्वार बताये गए अष्टांग योग को ही राजयोग कहा जाता है. इन आठ अंगों में सभी तरह के योगों का समावेश पाया जाता है.यह माना गया है की भगवन बुद्ध द्वारा बताया गया अष्टांगिक मार्ग भी इन आठ अंगों का हिस्सा है. परन्तु अष्टांग योगों की रचना बुद्ध के काल के बाद की है.

राजयोग कुंडली

यही कारण है की अष्टांग योग बुद्ध द्वारा बतए गए योग से ज्यादा प्रचलित एवं महत्पूर्ण है महर्षि पतंजलि द्वारा बताये गए योग को लिखित रूप में संगृहीत कर योग-सूत्र की रचना की गयी. योग सूत्र की रचना ने पतंजलि को योग पिता के रूप में प्रचलित करवाया.

राजयोग कुंडली

अष्टांग योग जो की समावेश है यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा,ध्यान और समाधी . इन सभी अंगों के अपने-अपने उप अंग हैं. वर्तमान काल में जिन अंगों का प्रचलन है वो इस प्रकार से हैं ध्यान, प्राणायाम और आसान.

राज योग को अलग अलग संधर्वों में अलग अलग अर्थों से जाना जाता है. यदि हम ऐतिहासिक काल की बात करें तो योग की अंतिम अवस्था अर्थात समाधी को राजयोग माना गया है. परन्तु आधुनिक काल में इसे हिन्दुओं के छः दर्शनों का अभिन अंग माना गया है .

राजयोग कुंडली

राजयोग को सभी योगों का राजा माना गया है.क्यूंकि इसमें सभी योगों की कुछ न कुछ समामिग्री होती है. इसमें महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अशांगों का वर्णन पाया गया है.यह माना गया यह विषय चित्तवृत्तियों के निरोध करने का है,यह मनुषय को ज्ञान, ख्याति,धन, आदि की प्राप्ति कराता है.

मनुषय में आपर शक्ति और ज्ञान का आवास होता है.राजयोग इन शक्तियों को जागृत करने का मार्ग प्रदर्शित करता है.,इसमे समाहित चित वालों के लिए अभ्यास तथा वैराग्य चित वालों के लिए क्रियप्रयोग का सहारा लेते हुये आगे बढ़ने का मार्ग बताया गया है .

राजयोग कुंडली

मनुषय स्वभाव चंचल होता है वह एक वास्तु पर स्थिर नहीं रहता है .राजयोग इस चंचलता को काबू कर मन को ेकागर करता है.

ज्योतिष में राजयोग के ३२ प्रकार बताये गयें हैं . यदि आपकी कुंडली में ३२ प्रकार के सभी योग पूर्ण रूप से घटित होजाते हैं तोह आप सम्पूर्ण सुख की प्राप्ति करते हैं..

राजयोग प्राप्ति के मंत्र कुछ इस प्रकार से हैं

घरकेउत्तर-पश्चिमकोणमेंमिट्टीकेपात्रमेंकुछसोने-चांदीकेसिक्केलालवस्त्रमेंबांधकररखें।फिरपात्रकोगेहूंयाचावलोसेभरदें।इससेधनकाअभावनहींरहेगा।

बुधवारकेदिनगायकोअपनेहाथोंसेहरीघासखिलायेतोआर्थिकस्थितिकीअनुकूलताकायोगबनेगा।

पीपलकेपांचपत्त्ोलेकरउन्हेंपीलेचंदनसेरंगकर,बहतेहुएजलमेंछोड़दें।यहउपायशुक्लपक्षसेआरंभकरें।गुरुपुष्पनक्षत्रहोतोबहुतअच्छाहै।

राजयोगकेलक्षणमनुषयकेशारीरअथवाकुंडलीदोनोंपरहीहोतेहैंपुरुषकेदाहिनेअथवास्त्रीकेबांयेअंगपरराजचिन्हकाहोनाउनकेराजयोगकोदर्शाताहै .

यहमानगयाहैकीजिनलोगोंकेपाँवकेतलवोंपेअकुंश, कडुंलयाचक्रकानिसानहोताहैवहकिसीबड़ेराष्ट्रकेशासकबनतेहैंतथाऐसेलोगोंकोसर्वश्रेष्ठशासकभीमनजाताहै.

मनुषयकीकुंडलीमेंनवेंऔरदसवेंस्थानकाबड़ामहत्वहोताहै.नवीनस्थानपरउसकाभाग्यतथादसवेंस्थानपरउसकेकर्महोतेहैं.

यदिजन्मकुंडलीकेनौवेंअथवादसवेंस्थानपरसहीग्रहमौजूदरहतेहैंतोऐसीपरिस्थितियोंमेंराजयोगकानिर्माणहोनासंभवहोजाताहै।

यहएकऐसायोगहैजोप्रत्यक्षअथवाअप्रत्यक्षराजाकेसमानसुखप्रदानकरवाताहै।इसयोगकीप्राप्तिमनुषयकोसभीसुखोंकीप्राप्तिकरवाताहै.

जन्म कुंडली में विवाह योग

जन्म कुंडली में विवाह योग

कुंडली में विवाह योग, किसी भी युवा व्यक्ति के जीवन के लिए सभी संस्कारों में विवाह श्रेष्ठ व आवश्यक है। इसकी सफलता-असफलता अगर दंपति के बीच आपसी विश्वास और वचनबद्धता पर निर्भर है, तो इस संदर्भ में विवाह पूर्व की जाने वाली जन्म-कुंडलियों की ज्योतिषीय गणना भी काफी महत्वपूर्ण साबित होती हंै। यह युवक-युवती के विवाह योग को बारीकी से विश्लेषित करता है। इसके द्वारा व्यक्ति के सुखद, सुसंस्कृत व सफल वैवाहिक जीवन की संभावनाओं का आकलन किया जाता है, तो यह बेहतर भविष्य निर्माण को मजबूत आधार भी देता है।

कुंडली में विवाह योग

आज के डिजिटल दौर में तकनीक की लहरों पर सवार युवा वैज्ञानिकता, आधुनिकता और खुद को अतिविकसित होने का तर्क चाहे जो भी दें, लेकिन वे ज्योतिष विज्ञान को नकार नहीं सकते हैं। सच तो यह भी है कि ज्योतिषीय दृष्टिकोण अपनाकर ही वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द्र, संस्कार और संवेदनशीलता की सुखद स्थितियों के संचार की उम्मीद की जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाले ग्रहों की दिशा और दशा के अनुसार विवाह योग बनते-बगड़ते हैं। जिन्हें समय रहते संतुलित किया जा सकता है, तो जन्म तिथि, समय व जन्म स्थान आधारित कुंडलियों का मिलान कर वैवाहिक जीवन की सफलता की कामना की जा सकती है।

कई बार देखा गया है कि सर्वगुण संपन्न लड़की को सुयोग्य जीवनसाथी नहीं मिल पाता है, या फिर उसके विवाह में विलंब होती है। इसी तरह से प्रतिभासंपन्न और सफल करिअर वाले युवक के विवाह में भी बाधा आती है। कुछ वैसे लोग भी होते हैं, जिनका वैवाहिक जीवन असफल हो जाता है, या फिर जल्द ही संबंध-विच्छेद तक की नौबत आ जाती है। यहां तक कि सफलता के शिखर पहुंचे व्यक्ति विवाह से वंचित रह जाते हैं। ऐसा अच्छी तरह से कंुडली मिलान नहीं किए जाने या विवाह योग नहीं बनने की वजह से ही होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार बनी कुंडली के अनुसार सकारातमक प्रभाव वाले ग्रहों की गतिशीलता पहचानकर नकारत्मक प्रभाव वाले ग्रह का दोष दूर करना आवश्यक होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बेहतर विवाह योग के लिए कुंडली के दूसरे, पांचवें, सातवें, आठवें और बारहवें घरों में बनी ग्रहों की स्थिति पर ध्यान दिय जाता है। इनमें मंगल, शनी, सूर्य, राहू और केतु ग्रहों की स्थिति का विशेष तौर पर परिणामी आकलन किया जाता है। इस आधार पर ही विवाह के उपयुक्त समय का निर्धारण भी संभव हो पाता है। पुरुष के लिए विवाह का कारक ग्रह जहां शुक्र है, वहीं स्त्री के लिए बृहस्पति होता है।

ये दूसरे ग्रहों के प्रभाव मंे आकर ही विवाह की अनुकूल या प्रतिकूल स्थितियां पैदा करते हैं। स्त्री की कुंडली का आठवां घर उसके भाग्य को दर्शाता है, तो स्त्री व पुरुष की कुंडली का बारहवां घर शैया-सुख अर्थात सुखद यौन-संबंध के बारे मंे बताता है। इसी अनुसार विपरीत लिंग के बीच लैंगिक आकर्षण बनता है और उनमें एक-दूसरे के प्रति अनुभूति प्रदान करने वाली भावनाएं जागृत होती हैं।

विवाह तय होने, वैवाहिक जीवन की मधुरता और पति-पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं का आकलन करने, संतान-सुख मिलने तथा तलाक की नौबत आने तक की बातों का विश्लेषण काफी जटिलता लिए होता है। वैसे कोई भी व्यक्ति चाहे तो अपनी कुंडली के सातवें घर को देखकर अपने विवाह के साथ-साथ जीवनसाथी संबंधी संभावनाएं जान सकता है। इस स्थान का कारक ग्रह शुक्र है, लेकिन यहां शनि की स्थिति मजबूत बनने और बृहस्पति के कमजोर पड़ जाने के कारण कुशल विवाह योग प्रभावित हो जाता है। सूर्य के प्रभाव में आने से तलाक जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, तो मंगल के आने से मांगलिक योग बन जाता है।

ज्यादातर लोग मंगल को ही विवाह के लिए बाधक मानते हैं। इसे मंगल योग कहा गया है। यह योग कुंडली के पहले, चैथे, सातवें और बारहवें घर में मंगल के होने से बनता है। यह विवाह में विलंब, विवाह के बाद दंापत्य में कलह, दंपति के स्वास्थ्य में गिरावट, दंपति के संबंध-विच्छेद यानि तलाक, या फिर जीवनसाथी की मृत्यु तक की आशंकाओं को भी जन्म देता है। मंगल योग के प्रभाव वाले व्यक्तियों का विवाह 27, 29, 31, 33, 35 या 37 वर्ष की उम्र में ही संभव हो पाता है।

इसके अतिरिक्त सातवें स्थान पर बुध की शक्ति भी कम हो जाती है। राहू और केतु के आने से जीवनसाथी से अलगाव की स्थितियां पैदा हो जाती हैं। राहू के सातवें घर में होने की स्थिति में पति-पत्नी के बीच नहीं चाहते हुए भी दूरी बढ़ने लगती है। दोनें में से किसी एक के मन में विरक्ती के भाव या वैसी अप्रत्याशित परिस्थितियां पैदा होने से अलगाव सुनिश्चित हो जात है। यह कहें कि पत्नी अगर पति से दूर भागती है, तो पति मजबूरन पत्नी से दूरी बनाए रहता है। दोनों की कुंडली के सातवें घर में राहू या केतु के होने की स्थिति में विवाह के सालभर के भीतर ही तलाक की नौबत आ जाती है।

इसी तरह से केतु के होने की स्थिति में दंपति आजीवन अलग-अलग जीवन व्यतीत करने को विवश होते हैं। या फिर पति-पत्नी न तो एक-दूसरे को पसंद करते हैं, और न ही वे वैचारिक स्तर पर मधुरता कायम कर पाते हैं। हालांकि इसे ज्योतीषिया गणना के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों से ग्रहों की स्थिति को सही करवाया जा सकता है। अब सातवें घर का स्वामी कुंडली के सातवें घर में ही होने पर ऐसा व्यक्ति सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत करता है। उन्नति की राह में कोई बाधा नहीं आती है और पति-पत्नी के आपसी संबंध मधुर बने रहते हैं।

ज्योतिष की भाषा में विवाह की स्थिति सप्तमेश यानि लग्नेश की महाअंतर्दशा या सिर्फ अंतर्दशा के बनने पर आती है। यानि कि सातवें घर की ग्रहीय स्थिति के साथ बृहस्पति अर्थात गुरु की महादशा और शुक्र की अंतर्दशा से विवाह योग की संभावना प्रबल हो जाती है। यह कहें कि सातवें या उससे संबंध रखने वाले ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में विवाह योग बन पाता है। जिस किसी की कुंडली में बृहस्पति सातवें घर में होता है, उसके शीघ्र विवाह होने की संभावन बनती है। संभव है उनका विवाह 21-22 वर्ष की उम्र में ही हो जाए।

इसी तरह से कुंडली के सातवें घर में शुक्र के होने की स्थिति में व्यक्ति का विवाह युवावस्था में ही संभव है। दूसरी तरफ बेमेल विवाह के योग कुंडली में चंद्रमा के उच्च स्थिति में होने के कारण बन सकते हैं। विवाह में देरी का मुख्य कारण मंगल के छठे घर में होना है।

विवाह योग के लिए कुंडली का मिलना करने वाले ज्योतिष द्वारा स्त्री की कुंडली में बृहस्पति और पुरुष की कुंडली में सूर्य को देखा जाता है। इसी के साथ सुखद वैवाहिक जीवन का विश्लेषण करने के सिलसिले में कुंडली के चैथे घर का अध्ययन किया जाता है। अर्थात विवाह का संपूर्ण निर्णय कुंडली के सातवें घर के अतिरिक्त चैथे, पांचवें और ग्यारहवें घर में स्थित ग्रहों की स्थितियों के आधार पर लिया जाता है।

मंगल दोष निवारण हे‍तु विवाह से पहले करें ये उपाय

मंगल दोष निवारण हे‍तु विवाह से पहले करें ये उपाय

मंगल दोष क्या है, मंगल दोष के लक्षण निवारण उपाय क्या है? सुरेश मांगलिक था, इस कारण से मांगलिक लड़की नीता ढूंढी गई। वधु के साथ वर पक्ष वालो ने सुख की साँस ली, हालांकि सुरेश और नीता को मांगलिक होने का अर्थ पता नहीं था। इस के ठीक विपरीत चंदा का विवाह इसलिए टूट गया क्योकि वह मांगलिक थी । ऐसे में प्रश्न उठता है कि मांगलिक होना क्या दुर्भाग्य की निशानी है? उत्तर है नहीं। अमूमन दस में से चार जोड़े मांगलिक होते है। जिस प्रकार बीमार व्यक्ति डॉक्टर के पास जाता है । उसी प्रकार ग्रह और नक्षत्रों की समस्या के लिए निवारण केवल ज्योतिषी दे सकते है।

आजकल की पीड़ी को किसी बात को मानने के लिए वैजानिक आधार की आवश्यकता होती है। ज्योतिष एक विज्ञान है, जिसे सदियों से सिखाया जा रहा है। जंतर -मंतर आज भी ज्योतिष विज्ञान का प्रतीक है। खगोलीय ज्ञान के लिए भारत में आज भी प्रसिद्ध है, लाभान्वित कर रहा है।

मंगल दोष के लक्षण निवारण उपाय

  • भारतीय ज्योतिषों की कुंडली दो प्रकार की गणना पर आधरित होती है , सूर्य और चंद्र। ज्योतिष अंक गणित एक से नौ तथा का प्रतिनिधित्व करता है । एक सूर्य का दो चंद्र का तथा नौ मंगल का नंबर माना जाता है । भारतीय ज्योतिष में राहु और केतु को आठवां और नवा ग्रह माना गया है।
  • जातक कुंडली में चन्द्र और सूर्य गणना के आधार पर प्रथम, द्वितीय,चतुर्थ सप्तम अष्टम तथा बारहवें स्थान पर मंगल होने से “मांगलिक दोष” की कुंडली कही जाती है। दोष का अर्थ होता है जातक के स्वभाव में क्रोध,ज़िद्द, शासन करने की प्रवृति पाई जाती है ।
  • वैजानिक दृष्टि से देखा जाए तो ऊर्जा का प्रवाह हमारे चारों ओर रहता है । हमारे जन्म के समय खगोलीय अवस्था से लेकर ग्रह हमारे आस -पास के वातावरण पर प्रभाव डालते है । इस प्रभाव के कारण हमारा प्राकृतिक व्यवहार निर्धारित होता है ।
  • ज्योतिष के अनुसार हमारे ग्रह जन्म लगन के अनुसार आचरण करते है । जो अच्छा और बुरा परिणाम दे सकते है। मंगल शुभ का कारक होता है।

मांगलिक कुंडली के लक्षण

  • जातक की कुंडली में, प्रथम भाव में मंगल शनि हो। ऐसे में राहु श्रीण चन्द्रमा के साथ हो। इसके साथ ही, शत्रु राशि कुंभ , मकर में हो । इस प्रकार की कुंडली मांगलिक दोष युक्त कही जाती है।
  • ज्योतिषियों के अनुसार विवाह मैं अड़चन आती है व् विवाह देर से होता है। यदि मंगल चतुर्थ भाव में हो तो जातक का विवाह शीध्र होता है। विवाह शीध्र तो होता है पर ग्रहस्थी में क्लेश और दुख बना रहता है । भूमि, भवन निर्माण संबंधी मामलों में उलझन होती है। घर के बड़े बूढ़ों से अनबन होती है।
  • मांगलिक दोष विवाह में व्यवधान डालता है। सप्तम भाव में मंगल हो तो विवाह में बाधा व् कठिनाइयाँ विवाह के उपरांत भी बनी रहती है।
  • इसी प्रकार अष्टम भाव में मंगल हो तो जातक के कुसंगति में पड़ने के योग बनते है|
  • ज्योतिष के अनुसार मंगल के अष्टम भाव में होने के कारण जीवन- साथी की मृत्य के साथ ज के योग होते है। मांगलिक दोष केवल एक। ग्रह दशा है जिसका निवारण सम्भव है।
  • बारहवें स्थान पर यदि मंगल हो तो जातक के विवाह उपरांत खर्च बढ़ जाते है , पारिवारिक संतुलन बिगड़ जाता है।

इन सब लक्षणों के होने पर भी यदि चंद्रमा केंद्र में है तो कुंडली मांगलिक दोष मुक्त होती है। मंगल शुभ का प्रतीक है। मंगल की स्थिति से रोज़ी – रोटी कारोबार की सफलता से जुडी है।मंगल अगर शनि जैसे ग्रह के साथ है तब ही अनिष्टकारी लगता है।जीवन में समस्या है तो निवारण भी है। प्रश्न है तो समाधान भी है। यही कारण है की भारतीय ज्योतिष केवल कुंडली से भविष्य दर्शन नहीं कराती वरन समाधान भी देती है।

मंगल दोष निवारण उपाय

  • विष को विष मरता है , किसी औषधि का प्रतिरोधक उसी बीमारी के जीवाणु से बनते है। इसी बात को ध्यान में अगर हम रखे तो मांगलिक से मांगलिक जातक का विवाह होना मंगल दोष का निवारण ही हैजिस कन्या की कुंडली में मंगल १,२, ४, ७, ८, १२ स्थान पर हो उसका विवाह ऐसे जातक के साथ करवाना चाहिए , जिसकी कुंडली में मंगल की सामान भाव की कुंडली में शनि बैठा हो।
  • मांगलिक दोष होने पर वधु पक्ष लड़की का पूर्व विवाह पीपल के साथ करता है। इसके अतिरिक्त शालिग्राम को पूजने और उस से सांकेतिक विवाह की रीत है।इसके अलावा शादी का मूल मन्त्र है, संयम जो किसी भी विवाह में काम आता है ।
  • लाल किताब के अनुसार ग्रहों के प्रभाव को प्रतिकूल बनाने के लिए, हिंदु घरों में पूजा अर्चना से मांगलिक दोष का निवारण बताया गया है। भगवान गणेश की पूजा और मंगल ग्रह का जप करने से दोष का सरल निवारण संभव है,मन्त्र “ॐ हिं णमो सिद्धाणं “II हज़ार बार के जाप से होता है इसके लिए पूजन व्यवस्था मंदिरों में होती है।
  • मंगल ग्रह का रंग लाल होता है इस कारण से लाल किताब में मांगलिक दोष के जातकों को लाल रंग का रुमाल रखना चाहिए।
  • मांगलिक दोष होने पर लाल किताब में वट- वृक्ष पर मीठा दूध चढ़ाने के बारे में बताया गया है।
  • इसके अलावा अपने पास चांदी रखे और चिड़ियों को दाना डाले।
  • पंचम भाव में यदि मंगल हो तो सर के पास पानी रख कर सोए। सुबह उठ कर वही पानी किसी पेड़ में डाले। पिता के नाम पे दूध का दान दे और पराई स्त्री से सम्बन्ध बनाने से बचे।
  • मंगल यदि छठे भाग में हो तो पिता और पुत्र को सोना धारण नहीं करना चाहिए।
  • लाल किताब के प्रयोगों को केवल अपनी कुंडली मिलान कर के ही करना चाहिए।
  • इस के अतिरिक्त अगर किसी कन्या का विवाह ऐसे व्यक्ति से निश्चित हो जाता है जो मांगलिक ना हो तब क्या करना चाहिए।
  • ज्योतिष बताते है ऐसे में हनुमान पूजा सहायक सिद्ध होती है। चाहे स्त्री हो या पुरुष लाल सिंदूर रख कर हनुमान जी का वर्त रख सकते है।
  • विवाह के उपरांत अगर जातक को पता चले कि वो मांगलिक दोष से पीड़ित है तो मन को
  • अशांत ना रखे। मंगल ग्रह लाल रंग कि और आकर्षित होता है इस कारण से रक्त पुष्प.रक्त चन्दन,लाल कपड़े में लाल मसूर दाल, मिष्ठान द्रव्य को साथ बांध कर नदी में बहा देना चाहिए।

कहना ना होगा सम्बन्ध मुश्किल से जन्मो के प्रयत्न से बनते है। मांगलिक दोष का निवारण लड़के और लड़की को ही नहीं घर वालों को भी रिश्ता बनाने में सहयोग देना चाहिए।

गज केसरी योग के फायदे

गज केसरी योग के फायदे

ज्योतिष में गज केसरी योग को राजयोग के रूप में देखा जाता है। ज्योतिष में गज केसरी योग को असाधारण योग की श्रेणी मे रखा गया है। यदि आपकी कुंडली में गज केसरी योग सही प्रकार से बना है तो आप निश्चित रूप से स्वास्थ्य, संपन्नता और संपत्ति के स्वामी होंगे। परंतु कभी -कभी यह देखने में भी आया है कि गज केसरी योग होने पर भी सुख और संतोष से दूर होते हैं। इसके पीछे कौन से कारण होते हैं और इनसे मुक्ति के क्या उपाय हैं? आइए…इस लेख के द्वारा हम यह जानने का प्रयत्न करते हैं-

गज केसरी योग

ज्योतिष के अनुसार गज केसरी योग क्या होता है-

कुंडली में यह योग होने पर चंद्रमा अथवा चंद्र लग्न को गुरु या दूसरे शुभ ग्रह शक्ति और लाभ प्रदान करते हैं। चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है और इसका संबंध जल से होता है। व्यक्ति के मान, सम्मान, धन, स्वास्थ्य, शक्ति, धैर्य प्राप्ति में इनका मुख्य योगदान होता है।

बहुत से व्यक्तियों की कुंडली में गज केसरी योग होने के पश्चात भी उनका जीवन संघर्षों से भरा देखा गया है। बहुत से कारण होते हैं जो राज केसरी योग पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। बहुत बार कुंडली में बन रहे इस योग के प्रभाव को अन्य योग भंग कर देते हैं और व्यक्ति भाग्य का धनी होते हुए भी संघर्षों में अपना जीवन व्यतीत करता है। विडंबना यह है कि व्यक्ति को इस बात का पता तक नहीं होता। राजकेसरी योग के फलादेश में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है-

  • शुभ गुरु-चंद्र – जब भी किसी की कुंडली में गज केसरी योग से प्राप्त होने वाले फलों पर विचार किया जाता है, तो गुरु और चंद्रमा के भावों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गुरु की शुभता का प्रभाव इस योग पर विशेष रूप् से पड़ता है। यदि गुरु और चंद्रमा के भावों में अशुभता का समावेश है जो इस योग का लाभकारी प्रभाव कम हो जाता है।
  • चंद्र का नकारात्मक स्थिति में होना – यदि किया व्यक्ति की कुंडली में चंद्र की स्थिति नकारात्मक है, तो इसे गज केसरी योग के अनुकूल कदापि नहीं समझा जाएगा। यदि चंद्र के पहले, दूसरे तथा बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो और चंद्र भी केमद्रुम योग में न हो, तो यह गज केसरी योग के लिए अत्यन्त लाभकारी माना जाता है। परंतु यदि चंद्र गंडान्त में हो, उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो यह गज केसरी योग के लाभ पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
  • गुरु और चंद्र का अशुभ योग – जब गुरु से चंद्र छठे, आंठवें अथवा बारहवें स्थान पर होता है, तो शकट योग का निर्माण करता है। इस योग को बनने का कारण गुरु से चंद्र की शडाष्टक भाव में होना है, इसलिए यह अनिष्टकारी फल देता है।
  • गज केसरी योग और केमद्रुम योग – गुरु के चंद्र के केंद्र में होने से गज केसरी योग बनता है। इस योग से लाभकारी फल प्राप्त करने के लिए चंद्र के दोनों ओर के भावों में सूर्य, राहू-केतू के अतिरिक्त अन्य पाँच ग्रहों में से किसी भी ग्रह का उपस्थित होना आवश्यक है।
  • गुरु का नकारात्मक स्थिति में होना – गुरु यदि वक्री हो तो गज केसरी योग से होने वाले लाभों में कमी आ जाती है। यदि कोई पाप ग्रह इस योग पर नकारात्म्क दृष्टि डाल रहा हो, तो संभावना यह होती है कि उस ग्रह की अशुभ विशेषताएँ इस योग में भी आ जाएँ।
  • गुरु और चंद्रमा की शुभ दृष्टि – आपकी कुंडली में यदि गुरु और चंद्रमा उच्च स्थिति में हैं, तो यह गज केसरी योग आपको बहुत ही शुभ परिणाम देगा। यदि इन दोनों मंे से एक भी ग्रह अपनी मुलकोण राशि में विराजमान हो और दूसरे ग्रह की स्थिति भी शुभ हो, तो भी गज केसरी योग का लाभकारी प्रभाव बना रहता है।
  • ग्रहो की दशा का गज केसरी योग पर प्रभाव – कुंडली में बन रहे किसी भी योग का परिणाम उससे संबंध रखने वाले ग्रहों की दशाओं पर निर्भर करता है। बहुत बार ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति की कुंडली में धनयोग और राजयोग होते हैं, परंतु ग्रहों की महादशा नहीं बन रही होती। इस कारण उस व्यक्ति की कुडली में बन रहा धनयोग और राजयोग फलहीन हो जाते हं। गज केसरी योग भी केवल तभी फलदायक सिद्ध होता है जब इस योग को गुरु और चंद्र की महादशा की प्राप्ति हो रही हो।
  • सामान्यतः यह देखा गया है कि गज केसरी योग का लाभकारी फल केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त हुआ है, जो गुरु या चंद्र की महादशा में पैदा हुए हैं।

इसके अतिरिक्त गुरु या चंद्र की अंतर्दशा में पैदा हुए व्यक्तियों को भी गज केसरी योग का शुभ फल मिलता है।

प्रसिद्ध व्यक्तियों की कुंडली में गज केसरी योग – अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों की कुंडलियों में गज केसरी योग देखा गया है, जो इस प्रकार से हैं-

महात्मा गाँधी
जार्ज केनेडी
रणवीर कपूर
अक्षय कुमार
राहुल द्रविड

गज केसरी योग के फल –

ऋषि पराशर के अनुसार यदि किसी की कुंडली में गज केसरी योग हो, तो व्यक्ति कुशल, योग्य, अति बुद्धिमान, वाक् कला में निपुण, राजसी सुखों को प्राप्त करने वाला होता है।

गज अर्थात हाथी को बुद्धिमान और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। हाथी के समान ही इस योगयुक्त व्यक्ति को भी अपनी बुद्धि और योग्यता पर अभिमान नहीं होता। इस योग से व्यक्ति यशस्वी बनता है। गज केसरी योग व्यक्ति की आयु भी बढ़ाता है।

गज केसरी योग होने पर निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-

  • गज केसरी योग होने पर धन की प्राप्ति – गुरु और चंद्र समस्त ग्रहों में धन कारक ग्रह माने जाते हैं। यदि इनका योग भली प्रकार से बने, तो गज के समान धन की प्राप्ति होती है।
  • गज और सिंह के समान योग्यताएं – यह योग व्यक्ति को सिंह और गज की विशेषताएं प्रदान करता है।
  • व्यवसायिक क्षेत्र में इस योग के फल – गज केसरी योग जब चैथे और दसवें भाव में बनता है, तो उस व्यक्ति का अपने कार्यक्षेत्र में वर्चस्व रहता है। जब कुंडली में चंद्र किसी किसी अशुभ योग में सम्मिलित न हो, तो गाज केसरी योग का लाभ पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
ये उपायों से दूर करें कुंडली में पितृदोष

ये उपायों से दूर करें कुंडली में पितृदोष

पितृ दोष निवारण उपाय – “नानक दुखिया सब संसार” इस संसार में कोई सुखी ही कहाँ है। सुख- और समृधि अपने – अपने परिवार में देखने की इक्छा हर किसी की होती है। इसी सुख को पाने के लिए इन्सान दिन रात मेहनत करता है। कभी – कभी पूरा जीवन कष्ट झेलते ही बीत जाता है, फिर भी यह समझ नहीं आता कि मेहनत करने पर धन और सुख क्यों प्राप्त नहीं हो पा रहे है।

पितृ दोष निवारण उपाय

कई बार जैसी करनी, वैसी भरनी कह कर हम दूसरों का उपहास करते है। जानकार इसे कर्म का दोष मानते है। पूर्व – जन्म के कारण कुंडली में पितृ-दोष लगता है।

पितृ- दोष और कारण –

जिन कारणों से पितृ- दोष लगता है, वह मानताएं जो जन साधारण में प्रचलित है।

  • “पितृ” यानि पिता जिसे जीविका का आधार माना गया है, तभी हम श्राध-कर्म, करते है और पितरों कों जल दे भोजन करातें हैं ।
  • संस्कृत में पितृ यानि पिता, पितर,पूर्वजों को पितर कहा जाता है। पूर्वज ऐसी आत्मा जो जीवित नहीं है, पूर्वज कहलाती है।
  • ज्योतिष जानने वाले मानते है कि नीच ग्रह नक्षत्रों के योग के कारण अकाल मृत्यु होती है।
  • अकाल मृत्यु— अकस्मात निधन हो जाए, या किसी दुर्घटना का कोई शिकार हो जाए। घर में कोई आत्महत्या कर ले। जहर खा कर या फांसी लगा ले, कुएँ में कूद कर अपनी जान दे, दे। कोई या आग लगने से मरे या ऐसी किसी भी अप्राकृतिक अवस्था में जान दे ,या मृत्यु का शिकार हो जाए उसका एक मात्र कारण है, पितृ- दोष।
  • जब किसी कार्य को करने में बाधा आए या जीवन नर्क समान बन जाए, तब समझ लेना चाहिए कि कुंडली में पितृ- दोष है। अकाल मृत्यु हो जाने पर आत्मा की शांति नहीं होती। इसलिए आत्मा मृत्यु –लोक में भटकती रहती है।
  • नव-शिक्षित समाज में इन मूल्यों का हास हो गया है। पूर्वज तो पूर्वज जीवित माता- पिता का कोई मूल्य नहीं रह गया है। ऐसे में जब समस्या आती है तभी निवारण के लिए लोग प्रयत्न करते है। घर परिवार के लोग अपने बुजुर्गों ओर पितरों को भूल जाते है, उसी कारण से आने वाली पीड़ी भी पितृ- दोष से पीड़ित हो जाती है।

आध्यातम के अनुसार संसार में सारे मनुष्य त्रिविध कष्ट भोग्तें है।

1- आध्यात्मिक 2. अधिभौतिक 3 अधिदैविक ये तीन प्रकार के कष्ट होते है।

ये कष्ट आत्मा के को कष्ट पहुँचने और पहुँचाने के कारण से होते है। कोई लाभ अगर किसी को दुख पहुंचा कर किया जाता है, तो वह अधिभौतिक कष्ट कहलाता है। हमारे लाभ इक्छा, कामनाये, जो जिनकी पूरित करने के लिए हम आत्मा को कष्ट देते है, वही पितृ- दोष कहलाते है।

यहाँ हम उन कष्टों कि बात कर रहे है जो पितृ- दोष के कारण भोगने पड़ते है।

  • घर में विवाह योग्य बच्चों का विवाह ना हो पाना और वैवाहिक जीवन में क्लेश होना।
  • परिश्रम के बाद भी सफ़लता ना मिलना सफ़लता में संदेह होना।
  • व्यवसाय में हानि या उतार- चड़ाव रहना।
  • नौकरी लगने में देर होना या नौकरी लग के छुट जाना।
  • शादी के बाद गर्भ-धारण में समस्या गर्भपात होना या संतान होने में कष्ट होना।
  • संतान का विकलांग हो जाना ।
  • बच्चों की अकाल मृत्यु होना या घर के सदस्यों का एक- एक कर के मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों के विरुद्ध कार्य करना।

माना जाता है, पितृ- दोष प्रारब्ध का दोष है। इस कारण से जिन हिन्दू घरों में अपने बड़ों का सम्मान नहीं, उन घरों में जन्म लेने वाले शिशुओं को पितृ- दोष लग सकता है।

ज्योतिष के अनुसार, पितृ- दोष जन्म कुंडली में दोष का निर्धारण प्रथम, दिवितीय,पंचम, सप्तम, दशम, तथा नवम भाव सूर्य राहू और शनि के आधार पर होता है। जन्म कुंडली में नवा भाव पिता और पितरों का भाव ,स्थान कहा गया है। यह स्थान जातक कि कुंडली में भाग्य का स्थान कहा गया है।

महर्षि पराशर मुनि के ग्रन्थ ब्रह्त्परशर होरा शास्त्र में सूर्य पिता कारक है और राहू छाया ग्रह है। जिस समय राहू कि युति यानि दृष्टि- संबंध सूर्य के साथ होता है तब सूर्य ग्रहण लगता है। इसी प्रकार जब जातक कि कुंडली में सूर्य –राहू की युति एक ही भाव एक ही राशि में होती है तो पितृ- दोष जन्म कुंडली में पाया जाता है।

  • कुंडली में केतू कमज़ोर हो या द्वितीय, नवम, दशम भाव पर भावेश पापी ग्रहों का प्रभाव हो। इसके साथ ही ग्रह अस्त या कमज़ोर हो तो पितृ- दोष कुंडली मे पाया जाता है।
  • लग्न और लग्नेश दोनों में से एक अत्यंत कमज़ोर स्थिति में हो।
  • लगनेश नीच का हो, उसी भाव में राहू और शनि युति संबंध बना रहे हो।ऐसे में पितृ-दोष जन्म कुंडली में पाया जाता है।
  • राहू यदि नवम में बैठ हो,और नवमेश में संबंध बनाता हो।
  • नवम भाव में ब्रहस्पति और शुक्र की युति बनाता हो, और दशम भाव में राहू और केतू का प्रभाव हो ।
  • शुक्र अगर मंगल और शनि द्वारा पीड़ित होता है।
  • जिस जातक कि कुंडली में दसमेश त्रि के भाव में हो साथ ब्रहस्पति पापी ग्रहों के साथ स्थित हो। लग्न और के पंचम भाव पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो, तब जातक की कुंडली में पितृ- दोष पाया जाता है।

ऐसे और कई ज्योतिष और खगोलीय कारण है, जिस से जातक की कुंडली पर पितृ- दोष का प्रभाव होता है।

पितृ दोष निवारण उपाय–

कुछ सरल उपाय जो ज्योतिष द्वारा बताए गए है।

  • सोमवार को व्रत रखे, नंगे पाँव जा कर इक्कीस आक, विल्वपत्र, पुष्प, कच्ची लस्सी के साथ पूजन कर इक्कीस सोमवार तक वर्त रखे।
  • पवित्र पीपल और बरगद के पेड़ लगाए। विष्णु भगवान के मन्त्र जाप और भगवत गीता का पाठ करने से पितृ- दोष में कमी आती है।
  • प्रतिदिन इष्ट देवता की पूजा करने से पितृ- दोष का शमन होता है।
  • कुंडली में पितृ- दोष हो तो किसी गरीब की बीमारी में सहायता करें या उसके विवाह में सहयोग करना चाहिए।
  • अपने स्वजन बंधुओ कि निवार्ण तिथि पर तर्पण कर ज़रुरत मंदों को भोजन कराए।

आपका कार्य सिद्ध हो इसके लिए जातक अपनी कुंडली जानकार व्यक्ति को दिखा कर परामर्श ले।

शनि की साढ़े साती से पाना चाहते हैं निजात जो करे ये उपाय

शनि की साढ़े साती से पाना चाहते हैं निजात जो करे ये उपाय

किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार शनि ही एकमात्र ग्रह है, जो सबसे अधिक समय तक प्रभावित करता है। एक राशि से दूसरी राशियों में प्रवेश करने वाले सभी ग्रहों की तरह ही शनि जब लग्न से 12वीं राशि में प्रवेश करता है तब वह उसके बाद की अगली दो राशियों से होकर गुजरने के बाद ही अपना ‘समय चक्र’ पूरा कर पाता है, जो साढ़े सात वर्ष का होता है। इस तरह से उसके एक राशि में ढाई साल तक जमे रहने के बाद अगली राशि को भी अपने प्रभाव में ले लेता है। ज्योतिष शास्त्र मं इसे ही शनि की साढ़े़ साती कहा गया है। यनि की शनि अपनी मंद गति की वजह से एक राशि को ढाई साल में पार कर पाता है तथा अपना समय चक्र पूरा करने के सिलसिले में तीन राशियों को अपने प्रभाव में ले लेता है। यह कहें कि मेष राशि में प्रवेश कर ढाई साल तक रहने वाला शनि उनके बाद की रशियों वृष और मिथुन में भी उतने ही समय तक बना रहता है।

शनि साढेसाती उपाय

शनि की साढ़े साती को लेकर कई तरह की मान्यताएं और कुछ भ्रांतियां हैं। व्यक्ति को इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों से गुजरना पड़ता है। हालांकि इसे न्यायप्रिय ग्रह की संज्ञा दी गई है। किसी के लिए यह अगर मुश्किलें बढ़ाने वाला, तो किसी के लिए सुखद और लाभकारी नतीजे देने वाला साबित होता है। वैसे अधिकतर लोग शनि की साढ़े साती से काफी आशंकित रहते हैं और उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए तरह-तरह के उपायों का सहारा लेते हैं। अधिकतर ज्ञानवान ज्योतिष की मानें तो शनि सभी के लिए कष्टकर नहीं होते हैं, बल्कि कुछ के लिए तो यह काफी सुखद असर वाले साबित होते हैं। वैसे शनि को दंडदेने वाला कहा गया है।

साढ़े साती के चरणः शनि की साढ़े साती के तीन चरण होते हैं, जिनके प्रभाव अलग-अलग तरह के असर वाले लौह पाद, ताम्र पाद और स्वर्ण पाद के रूप में होते हैं। पहला चरण अगर वृषभ, सिंह और धनु राशियों के लिए कष्टदायक, दूसरा चरण या मध्य चरण मेष कर्क, सिंह, वृश्चिक और मकर राशियों के लिए प्रतिकूल असर वाला तथा अंतिम चरण मिथुन, कर्क, तुला, वृश्चिक और मीन राशि वालों के लिए कष्टकारी माना गया है।

पहला चरणः शनि अपने पहले चरण में आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है। इस सिलसिले में आय-व्यय असंतुलित बन सकता है या फिर अनावश्यक खर्च से दूसरी तरह की बाधाएं उत्पन्न हो जाती हैं। कई बाद आचानक धन की हानि भी हो सकती है। शारीरिक कष्ट के तौर पर अनिद्रा से होने वाली बीमारियां या मानसिक चिंता बढ सकती है, या फिर दूसरे तरह की अस्वस्थता की भी आशंका बनी रहती है। यात्रा के अचानक टलने या मेहनत के अनुरूप परिणाम के नहीं मिलने जैसी बातें होती हैं।

दूसरा चरणः इस दौरान शनि पारिवारिक जीवन के अतिरिक्त करिअर, कारोबार या कहें व्यवसायिक जीवन को प्रभावित करता है। प्रोफेशन में काफी उतार-चढ़ाव आ सकता है, तो घर-परिवार के प्रति जिम्मेदारियांे के निर्वाह में कमी रह जाती है। यह रिश्ते-नातों से दूरी बढ़ाकर मन में निराशा के भाव उत्पन्न करता है। इस चरण में भी आर्थिक परेशानियां बनी रहती हैं, साथ में वैचारिक मतभेद भी उभरते हैं।

तीसरा चरणः इस चरण में व्यक्ति थोड़ा सहज रहता है, लेकिन उसके भौतिक सुखों में कमी बनी रहती है। किसी भी कार्य की पूर्ति के लिए अधिक प्रयत्न और सूझबूझ दिखने की जरूरत होती है। स्वाभाव में आक्रामकता जैसे बदलाव आने से वाद-विवाद होने की आशंका बन सकती है। आकस्मिक सेहत की परेशानी भी आ सकती है।

किन राशियों पर कितना असरः आने वाले समय में विभिन्न राशियों पर शनि का असर उसके 2 नवंबर 2016 की संध्या समय से तुला से वृश्चिक राशि में प्रवेश करने के बाद इस प्रकार हो सकता हैः-

  • ज्योतिषीय गणना के अनुसार तुला और वृश्चिक के अतिरिक्त धनु राशि भी साढ़े साती के प्रभाव में आ चुके हैं।
  • तुला राशि पर शनि का तीसरा यानि अंतिम चरण 26 जनवरी 2017 को खत्म हो जाएगा, लेकिन शनि के वक्री औ मार्गी होने से तुला वाले शनि के प्रभाव से 26 अक्टूबर 2017 को ही मुक्त हो पाएंगे।
  • सिंह राशि वाले 26 अक्टूबर 2017 तक शनि की ढैय्या के प्रभाव में रहेंगे। जबकि वृश्चिक वालों पर शनि का पूर्ण असर 24 जनवरी 2020 तक और धनु पर 17 जनवरी 2023 तक बना रहेगा।
  • किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के चैथे, आठवें या 12वें घर में शनि है तो उस व्यक्ति पर शनि देव की कृपा बनी रहती है। वैसे शनि जिस भी स्थिति में हो वह कष्ट देता ही है। यह मकर और कुंभ राशि का स्वामी है।

शनि साढेसाती उपाय

शनि की साढ़े साती के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के कुछ सामान्य और वैदिक अनुष्ठान के उपाय निम्नलिखित हैं, जिन्हें ज्योतिषीय देखरख में करने से सकारात्मक परिणाम आते हैं और विकट से विकट दौर में भी शनि भयभीत नहीं करता है।

शनि देव के कोप या उनकी कड़ी परीक्षा से राहत पाने के लिए प्रत्येक शनिवार को तेल का दान करना अच्छा होता है। इसके लिए एक कटोरी में तेल में अपना मुंह देखने के बाद उसका दान किया जाना चाहिए।
प्रत्येक शनिवार को किसी शनि मंदिर में प्रातः या संध्या को ओम शनैश्चराय नमः मंत्र का 108 बार जाप करने से मन को शांति मिलती है और रोममर्रे के कामकाज में गतिशीलता आती है।
एक टोटके के तौर पर काले घोड़े की नाल का बना छल्ला मध्यमा उंगली में पहनने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। इस छल्ले को शनिदेव की पूजा अर्चना के बाद शनिवार को धारण करना चाहिए। कौवे के प्रतिदिन रोटी खिलाने का भी लाभ मिल सकता है।
प्रत्येक शनिवार की शाम अर्थात सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले पीपल के वृक्ष का पूजन करने के बाद जलाभिषेक करें तथा सात बार परिक्रमा करें, और फिर वृ़क्ष की जड़ के समीप सरसों तेल का दीपक जलाएं।
शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पत्नी के नामों का प्रतिदिन जाप करने से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। उससे संबंधित मंत्र इस प्रकार हैः-

ध्वजिनी धामिनी चेव कंकाली कलह प्रिहा,
कंकटी कलही चाउथ तरुंगी महिषी अजा।
शनैर्नामानि पत्नी नामेतानि संजपन् पुमान्,
दुःखानि नाश्येन्नित्यं सौभाग्यमेधते सुखमं।

शनि की साढ़े साती के असर को दूर करने के लिए हर मंगलवार और शनिवार को मंदिर मंे हनुमान की पूजा सिंदूर और चमेली तेल अर्पण के साथ करें, और फिर हनुमान चालिसा का पाठ करें।
सुंदरकांड या हनुमान चालिसा का नियमित पाठ करने से भी शनि की साढ़े साती के लिए सरल उपायों में से एक है। साथ ही शनिदेव से जुड़ी वस्तुओं में काली उड़द की दाल, तिल, लौह, काले कपड़े, तेल आदि का दान किया जाना चाहिए।